बुद्ध की दस परमिताएँ


(1) दान परिमिता
“मै बुद्ध अवश्य होऊँगा”, (इस प्रकार का) निश्चय कर, बुद्ध बनाने वाले धमों का निश्चय करने के लिये सोचा- बुद्ध बनाने वाले धर्म कहाँ है? ऊपर हैं, नीचे हैं, (वा) दस दिशाओं में हैं? इस प्रकार क्रम से सभी धर्मों ( धर्म धातुओं) पर विचार करने लगा। जो जो बुद्धपद की प्राप्त में सहायक धर्म है , उन्हें भी ढूढ़ना चाहिए, यह सोचते हुए, पूर्व ऋषियों (बोधिसत्वो) से सेवित दान-पारमिता को देखा। और मन में कहा -‘पण्डित सुमेध ! अब से तुझे पहले दान-पारमिता पूरी करनी होगी। जिस प्रकार पानी का घड़ा उलटने पर अपने को बिलकुल खाली कर, पानी गिरा देता है, और फिर वापिस ग्रहण नहीं करता, इसी प्रकार धन, यश, पुत्र, दारा अथवा (शरीर का) अङ्ग प्रत्यङ्ग (किसी) का (भी कुछ) ख्याल न कर, जो कोई भी याचक आवे, उसकी सभी इच्छित (वस्तुओं) को ठीक से प्रदान करते हुए, बोधिवृक्ष के नीचे वैठकर तू बुद्ध-पद को प्राप्त होगा। इसलिए पहले तू दान पारमिता (की पूर्ति) के लिए दृढ़ संकल्प (अधिष्ठान) कर।
(1) शील पारमिता
‘बुद्ध बनाने वाले धर्म इतने ही नहीं होंगे। और भी जो जो बुद्धपद की प्राप्त में सहायक धर्म है, उन्हें भी ढूढ़ना चाहिए, यह सोचते हुए, पूर्व ऋषियों (बोधिसत्वो) से सेवित शील-पारमिता को देखा। और मन में कहा -‘पण्डित सुमेध !’ अब से तुझे शील-पारमिता भी पूरी करनी होगी। जिस प्रकार चमरी (-चमरी-मृग) अपने जीवन की परवाह न कर, अपनी पूंछ की रक्षा करता है, इसी प्रकार तू भी अब से जीवन की भी परवाह न कर शील रक्षा करते हुए बुद्ध-पद को प्राप्त होगा। “(इसलिए) तू द्वितीय शील-पारमिता (की पूति) का दृढ़ संकल्प कर।”
(3) नैष्क्रम्य पारमिता
‘बुद्ध बनाने वाले धर्म इतने ही नहीं होंगे। और भी जो जो बुद्धपद की प्राप्त में सहायक धर्म है, उन्हें भी ढूढ़ना चाहिए, यह सोचते हुए, पूर्व ऋषियों (बोधिसत्वो) से सेवित नैष्क्रम्य -पारमिता को देखा। और मन में कहा -‘पण्डित सुमेध ! अब से तुझे नैष्क्रम्य पारमिता भी पूरी करनी होगी। जिस प्रकार कारागार में चिरकाल तक रहने वाला मनुष्य भी कारागार के प्रति स्नेह नहीं रखता, वहाँ न रहने के लिए ही उत्कण्ठित रहता है, इसी प्रकार तू सब योनियों (भवों) को कारागार सदृश ही समझ, सब योनियों से ऊब कर उन्हें छोड़ने की इच्छा कर, नैष्क्रम्य की ओर झुक। इस प्रकार तू बुद्ध पद को प्राप्त होगा। (इस लिए) तू तृतीय नैष्क्रम्य-पारमिता (की पूति) का दृढ़ संकल्प (अधिष्ठान) कर ।
(4) प्रज्ञा पारमिता
‘बुद्ध बनाने वाले धर्म इतने ही नहीं होंगे। और भी जो जो बुद्धपद की प्राप्त में सहायक धर्म है, उन्हें भी ढूढ़ना चाहिए, यह सोचते हुए, पूर्व ऋषियों (बोधिसत्वो) से सेवित प्रज्ञा-पारमिता को देखा। और मन में कहा -‘पण्डित सुमेध ! अब से तुझे प्रज्ञा-पारमिता भी पूरी करनी होगी। उत्तम, मध्यम, अधम किसी को भी बिना छोड़े सभी पण्डितों के पास जाकर प्रश्न पूछने होंगे। जिस प्रकार भिक्षा माँगने वाला भिक्षु (उत्तम-मध्यम) हीन (सभी) कुलों में किसी को भी न छोड़ कर एक ओर से भिक्षाटन करते हुए शीघ्र ही (आवश्यक) भोजन (यापन) प्राप्त कर लेता है, इसी प्रकार तू भी सभी पण्डितों के पास जाकर प्रश्न पूछते पूछते बुद्ध-पद को प्राप्त कर लेगा।” इसलिए तू चतुर्थ प्रज्ञा-पारमिता (की पूर्ति) का दृढ़ संकल्प कर।
(5) वीर्यपारमिता
‘बुद्ध बनाने वाले धर्म इतने ही नहीं होंगे। और भी जो जो बुद्धपद की प्राप्त में सहायक धर्म है, उन्हें भी ढूढ़ना चाहिए, यह सोचते हुए, पूर्व ऋषियों (बोधिसत्वो) से सेवित वीर्य-पारमिता को देखा। और मन में कहा -‘पण्डित सुमेध ! अब से तुझे वीर्यपारमिता भी पूरी करनी होगी। जिस प्रकार (मृग-) राज सिंह सब अवस्थाओं (ईयपिथों) में दृढ़ उद्योगी है, उसी प्रकार तू भी सब योनियों में, सब अवस्थाओं में दृढ़ उद्योगी, निरालस्य, और यत्नवान हो बुद्ध-पद को प्राप्त होगा। (इसलिए) तू पाँचवीं वीर्य-पारमिता (की पूर्ति) का दृढ़ संकल्प कर।
(6) क्षान्ति पारमिता
‘बुद्ध बनाने वाले धर्म इतने ही नहीं होंगे। और भी जो जो बुद्धपद की प्राप्त में सहायक धर्म है, उन्हें भी ढूढ़ना चाहिए, यह सोचते हुए, पूर्व ऋषियों (बोधिसत्वो) से सेवित क्षान्ति-पारमिता को देखा। और मन में कहा -‘पण्डित सुमेध ! अब से तुझे क्षान्ति पारमिता भी पूरी करनी होगी। सम्मान और अपमान, दोनों को सहना होगा। जिस प्रकार पृथ्वी पर (लोग) शुद्ध चीज भी फेंकते हैं, अशुद्ध चीज भी फेंकते हैं। पृथ्वी सहन करती है। न तो (अच्छी चीज फेंकने से) खुश होती है, न (बुरी चीज फेंकने से) नाराज। इसी प्रकार तू भी सम्मान तथा अपमान, दोनों को सहने वाली होकर ही बुद्ध-पद को प्राप्त होगा। इसलिए तू छठी क्षान्ति-पारमिता (की पूति) का दृढ़ संकल्प कर।
(7) सत्य पारमिता
‘बुद्ध बनाने वाले धर्म इतने ही नहीं होंगे। और भी जो जो बुद्धपद की प्राप्त में सहायक धर्म है, उन्हें भी ढूढ़ना चाहिए, यह सोचते हुए, पूर्व ऋषियों (बोधिसत्वो) से सेवित सत्य-पारमिता को देखा। और मन में कहा -‘पण्डित सुमेध ! अब से तुम्हें सत्य पारमिता भी पूरी करनी होगी। चाहे सिर पर बिजली गिरे, धन आदि का अत्यधिक लोभ हो तो भी जान बूझ कर झूठ न बोलना चाहिए। जिस प्रकार शुक्र का तारा (औषधि) चाहे कोई ऋतु हो अपने गमन-मार्ग को छोड़ कर, दूसरे मार्ग से नहीं जाता, अपने ही मार्ग से जाता है। इसी प्रकार तू भी सिवाय सत्य को छोड़, मृषावाद न करके ही बुद्धत्व को प्राप्त होगा। (इसलिए) तू सातवीं सत्य-पारमिता (की पूति) का दृढ़ अधिष्ठान कर।
(8) अधिष्टान-पारमिता
‘बुद्ध बनाने वाले धर्म इतने ही नहीं होंगे। और भी जो जो बुद्धपद की प्राप्त में सहायक धर्म है, उन्हें भी ढूढ़ना चाहिए, यह सोचते हुए, पूर्व ऋषियों (बोधिसत्वो) से सेवित अधिष्टान-पारमिता को देखा। और मन में कहा -‘पण्डित सुमेध ! अब से तुझे अधिष्ठान पारमिता भी पूरी करनी होगी। जो अधिष्ठान ( दृढ़ निश्चय) करना होगा, उस अधिष्ठान पर निश्चल रहना होगा। जिस प्रकार पर्वत सब दिशाओं में (प्रचण्ड) हवा के झोंके के लगने पर भी, न काँपता है न हिलता है, और अपने स्थान पर स्थिर रहता है, इसी प्रकार तू भी अपने अधिष्ठान में निश्चल रहते हुए ही बुद्ध-पद को प्राप्त होगा। (इसलिए) तू आठवीं अधिष्ठान पारमिता (की पूर्ति) का दृढ़ संकल्प कर।
(9) मैत्री-पारमिता
‘बुद्ध बनाने वाले धर्म इतने ही नहीं होंगे। और भी जो जो बुद्धपद की प्राप्त में सहायक धर्म है, उन्हें भी ढूढ़ना चाहिए, यह सोचते हुए, पूर्व ऋषियों (बोधिसत्वो) से सेवित मैत्री-पारमिता को देखा। और मन में कहा -‘पण्डित सुमेध ! अब से तुझे मैत्री-पारमिता भी पूरी करनी होगी। हित, अनहित सब के प्रति समानभाव रखना होगा। जिस प्रकार पानी, पापी और पुण्यात्मा दोनों के लिए एक जैसी शीतलता रखता है, उसी प्रकार तू भी सब प्राणियों के प्रति एक जैसी मैत्री रखते हुए बुद्ध-पद को प्राप्त होगा। (इसलिए) तू मैत्री-पारमिता (की पूर्ति) का दृढ़ निश्चय कर।
(10) उपेक्षा पारमिता
‘बुद्ध बनाने वाले धर्म इतने ही नहीं होंगे। और भी जो जो बुद्धपद की प्राप्त में सहायक धर्म है, उन्हें भी ढूढ़ना चाहिए, यह सोचते हुए, पूर्व ऋषियों (बोधिसत्वो) से सेवित उपेक्षा-पारमिता को देखा। और मन में कहा -‘पण्डित सुमेध ! अब में तुझे उपेक्षा-पारमिता भी पूरी करनी होगी। सुख और दुख में मध्यस्थ ही रहना होगा। जिस प्रकार पृथ्वी शुचि और अशुचि दोनों को (उसपर) फेंकने पर भी मध्यस्थ ही रहती है, इस प्रकार तू भी सुख, दुख दोनों में मध्यस्थ रहते हुए बुद्ध-पद को प्राप्त होगा। (इसलिए) तू दसवीं उपेक्षा-पारमिता (की पूर्ति) का दृढ़ निश्चय कर।

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